सच क्या है ?




"धर्म या मजहब का असली रूप क्या है ? मनुष्य जाती के
शैशव की मानसिक दुर्बलताओं और उस से उत्पन्न मिथ्या
विश्वाशों का समूह ही धर्म है , यदि उस में और भी कुछ है
तो वह है पुरोहितों, सत्ता-धारियों और शोषक वर्गों के
धोखेफरेब, जिस से वह अपनी भेड़ों को अपने गल्ले से
बाहर नहीं जाने देना चाहते" राहुल सांकृत्यायन



















Tuesday, August 30, 2011

अपने देश के बारे में हमारी गलतफहमियाँ


अपने देश के बारे में हमारी गलतफहमियों का मूल हमारी शिक्षा व्यवस्था में छुपा हुआ है ,जो हमें यह तो बताती है की हम दो हजार वर्षो से गुलाम थे परन्तु इस बात पर मौन हो जाती है की गुलाम क्यूँ थे ,

हमारी गुलामी का कारन विदेशी आक्रमण नहीं थे बल्कि इसका कारण था हमारा धर्म और हमारी धर्मभीरुता ,जब जब हमारे ऊपर संकट आये तब तब हमने उनका सामूहिक हल ढूंढने के बजाये किसी अवतार के आने की प्रतीक्षा में भजन गाते रहे , हमारा धर्म हमारी परम्पराएं और हमारी सोच हमें जाती और सम्प्रदाए के नाम पर टुकडो टुकडो में विभाजित करती रही जिसके परिणामस्वरूप देश का आधे से भी बड़ा जनसमूह शुद्र और अछूत बनकर अपने ही देश में जानवरों की जिंदगी जीने को मजबूर हुआ . हमें इसी भेदभाव से ही कभी फुर्सत नहीं मिली की हम आगे की सोच पाते ,

जब भी किसी ने इस जहालत को दूर करने का प्रयास किया उसे गालिया दी गयी प्रताड़ित किया गया यहाँ तक की उसे मार डाला गया , आर्य भट्ट ने जब कहा की प्राणनेति कला:भुर्वः अर्थात -पृथ्वी घुमती है तो उनका मजाक उड़ाया गया . बुध ने जब कहा की ब्रह्मा विष्णु महेश आत्मा और परमात्मा यह सब काल्पनिक है तब उन्हें गालिया दी गयी . उन्हें रामायण जैसे तथकथित ज्ञान के ग्रंथो में चोर तक कहा गया है इसी तरह दयानंद सरस्वती को पुरानो की निंदा करने के अपराध में जहर देकर मार डाला गया .


तमाम बड़े दावो के बावजूद भी वर्तमान में देश की दयनीय स्थिति के मूल कारणों की खोज में जब हम जाने की कोशिश करते है तब हमें आभास होता है की कमी हमारी स्वयं की मानसिकता में है जो हमारे धर्म द्वारा ही संचालित होती है .हमारे धार्मिक ग्रंथो में अन्धविश्वाश अज्ञान और भेदभाव पैदा करने के आलावा ऐसा कुछ भी नहीं है जिसमे से हम विज्ञान की एक बूँद भी निकल सकें .


इसीलिए हम मंगल गृह से हाथ जोड़कर अपने अमंगल न होने की प्रार्थना करते रह जाते है और विदेशी मंगल की मिटटी में अपने हाथो से बने यन्त्र दौड़ा रहे होते है हम त्रेतायुग की काल्पनिक बकवासो में पुष्पक विमान को ढून्ढ रहे होते है तभी विदेशी राइट बंधू अपने मेहनत का विमान आकाश में उड़ा देते है .जब हम बैलगाड़ी में तीर्थयात्राओ में व्यस्त थे तब विदेशी भाप द्वारा रेलगाड़ी बनाने की जुगत में लगे हुए थे .हम चक्रवर्ती होने और देवताओ से दिव्यास्त्र पाने के लिए अश्वमेघ यज्ञ करवा रहे होते है तभी विदेशी अपने हाथो से बने अग्नेआस्त्र यानि तोपों द्वारा हमला कर के हम पर ही चक्रवर्ती हो जाते है उनके बन्दूको का मुकाबला हम तीर तलवार लाठी और डंडो से करके हर जाते है .

सही मायने में आज जो कुछ भी थोडा बहुत अगर इस देश में अच्छा है तो वह हमारे संस्कारो के वजह से नहीं बल्कि विदेशी सभ्यता की वजह से है .हमारे संस्कार और धर्म तो हमें औरतो को जिन्दा जलाने की प्रेरणा देते थे जिसे सती प्रथा कहकर हम गौरवान्वित होते थे जिस पर अंग्रेजो ने ही 1828 में रोक लगाई .नारी अस्मिता का ज्ञान हमें पश्चिम से ही सिखने को मिला हम तो उन्हें पढाना पाप समझते रहे और उन्हें कम उम्र में ही विवाहित कर ससुराल भेजने में अपनी परंपरा की दुहाई देते रहे .हम तो अपने ही भाइयो को अछूत कहकर दुत्कारते रहे जिन्हें विदेशियों ने ही सर्वप्रथम अपनाकर उन्हें अपनी नौकरियों में स्थान दिया .
शकील प्रेम

1 comment:

  1. निश्चय ही कमी रही होगी। लेकिन इस बारे में आपसे कई जगह मतभेद हैं।

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