सच क्या है ?




"धर्म या मजहब का असली रूप क्या है ? मनुष्य जाती के
शैशव की मानसिक दुर्बलताओं और उस से उत्पन्न मिथ्या
विश्वाशों का समूह ही धर्म है , यदि उस में और भी कुछ है
तो वह है पुरोहितों, सत्ता-धारियों और शोषक वर्गों के
धोखेफरेब, जिस से वह अपनी भेड़ों को अपने गल्ले से
बाहर नहीं जाने देना चाहते" राहुल सांकृत्यायन



















Thursday, September 8, 2011

काश कोई धर्म न होता



.......काश कोई धर्म न होता
.......काश कोई मजहब न होता

ना गुजरात कभी सिसकता
ना कंधमाल होता
ना गोधरा, गोहाना
ना मिर्च पुर बिलखता

ना तेरा दर्द होता, ना मेरा घाव होता
तुझसे मुझे मुहब्बत, मुझे तुझसे लगाव होता
ना बम धमाके होते, ना गोलियां बरसती
ना असीमानंद होता, ना कसाब होता

.......काश कोई धर्म न होता
.......काश कोई मजहब न होता

ना मस्जिद आजान देती, ना मंदिर के घंटे बजते
ना अल्ला का शोर होता, ना राम नाम भजते
ना हराम होती, रातों की नींद अपनी
मुर्गा हमें जगाता, सुबह के पांच बजते

ना दीवाली होती, और ना पठाखे बजते
ना ईद की अलामत, ना बकरे शहीद होते

.......काश कोई धर्म ना होता
.......काश कोई मजहब ना होता


ना अर्ध देते , ना स्नान होता
ना मुर्दे बहाए जाते, ना विसर्जन होता
जब भी प्यास लगती , नदिओं का पानी पीते
पेड़ों की छाव होती , नदिओं का गर्जन होता

ना भगवानों की लीला होती, ना अवतारों का नाटक होता
ना देशों की सीमा होती , ना दिलों का फाटक होता

.......काश कोई धर्म ना होता
.......काश कोई मजहब ना होता

कोई मस्जिद ना होती, कोई मंदिर ना होता
कोई दलित ना होता, कोई काफ़िर ना होता
कोई बेबस ना होता, कोई बेघर ना होता
किसी के दर्द से कोई, बेखबर ना होता

ना ही गीता होती , और ना कुरान होता
ना ही अल्ला होता, ना भगवान होता
तुझको जो जख्म होता, मेरा दिल तड़पता
ना मैं हिन्दू होता, ना तू मुसलमान होता

तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता
फिर ना बंगलादेश बंटता, ना पकिस्तान होता

.......काश कोई धर्म ना होता
.......काश कोई मजहब ना होता

ना आतंक वाद होता, ना अत्याचार होता
ना अन्याय होता, ना भ्रष्टाचार होता
ना आबरू सिसकती, ना बलात्कार होता
ना किसी को जख्म मिलता, ना व्यभिचार होता

ना जातियां ही होती , ना बंटाधार होता
जुल्मो-सितम किसी पे, ना बार-बार होता
ना नफरतें ही होती, ना सरहदें ही होती
ना फसाद होते, बस प्यार-प्यार होता

.......काश कोई धर्म ना होता
.......काश कोई मजहब ना होता

ना परमाणुओं का खतरा, ना ऐटम-बम होते
ना मिसाइलों की दहशत, ना ड्रोन-बम होते
ना पासपोर्ट लगता, ना किसी पे शक होता
पृथ्वी की हर जमीन पे, सभी का हक़ होता

ना बेबसी ही होती, ना कोई गरीब होता
दुखों से दूर मानव, सुख के करीब होता
ना रोटी की जंग होती, ना झोपड़ का दर्द होता
संसाधनों का अवसर, सबको नसीब होता

ना तीर्थ कोई , ना हज्ज फर्ज होता
कोई ख़ुदकुशी न करता, ना किसी पे कर्ज होता

.......काश कोई धर्म ना होता
.......काश कोई मजहब ना होता

6 comments:

  1. यदि धर्म नहीं होता तो आज मनुष्य इतनी प्रगति कर चुका होता कि उसकी कल्पना करना मुश्किल है। इंसान आपस में ही लड़-लड़कर एक दूसरे को बर्बाद नहीं करते। धर्म ने मनुष्य की बुद्धि को जकड़ कर उसे सदैव पुरातनपंथी बनाए रखा है। ईश्वर के विषय में सभी धर्मों के अलग-अलग विश्वास ही सभी सम्प्रदायों की जड़ है। इसलिए जब तक ईश्वर का विश्वास रहेगा, धर्म रहेंगे। बहुत ही बढ़िया कविता है। हो सके तो इसे अपने नवभारत के ब्लॉग पर भी लगाइयेगा वहां ज्यादा पाठक इसे पढ़ पाएंगे।

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  2. अच्छे गुणों को धारण करना ही यदि धर्म रहा होता तो कोई कष्ट नहीं था. धर्म का तो हुलिया ही बदल दिया धर्म के ठेकेदारों ने. आपके विचारों से सहमत हूँ.

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  3. शकील जी, आपके विचारों को एवं आपकी रचना को सलाम।
    आपकी रचना से मेरे विचारों को बल मिला, तथा इस की रचना
    लिखने के लिये प्रेरणा। कृपया मेरे ब्लॉग पर आकर अपने विचारों
    से आवगत कराकर मेरा मार्ग-दर्शन करें।

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  4. बिल्कुल सत्य ..एक -२ अंश सत्य ...

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  5. धर्म, मजहब और तत्संबंधित सारी बातें अप्रबुद्ध, अविद्याजन्य है. इनकी पस्सना/देखनाही इनसे छुटकारा दिलाएगी और सारी समस्याऍं समाप्त हो जाएंगी.

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