सच क्या है ?




"धर्म या मजहब का असली रूप क्या है ? मनुष्य जाती के
शैशव की मानसिक दुर्बलताओं और उस से उत्पन्न मिथ्या
विश्वाशों का समूह ही धर्म है , यदि उस में और भी कुछ है
तो वह है पुरोहितों, सत्ता-धारियों और शोषक वर्गों के
धोखेफरेब, जिस से वह अपनी भेड़ों को अपने गल्ले से
बाहर नहीं जाने देना चाहते" राहुल सांकृत्यायन



















झूठी आज़ादी-क्या हम आज़ाद है?

15 अगस्त 1947 को भारत की धरती से अंग्रेजों का राज्य समाप्त हो गया। गोरे अपने इंग्लैण्ड वापस चले गये। देश पर अपने ही देशवासियों का शासन हो गया। चारों ओर आजादी का जश्न मनाया गया। जगह जगह रोशनियां की गयीं। स्थान स्थान पर मिठाइयां बांटी गयीं। छोटे बड़े जलसे किये गये। कहने का तात्पर्य खुशियां ही खुशियां। यह सब किस लिए? इसलिए कि अब भारतवासी परतंत्राता की बेड़ियों से मुक्त हो गये, लोग आजाद हो गये। सदियों बाद उन्हें आजादी मिली। किन्तु ऐसा लगता है कि यह सब सपना काफूर हो गया। क्योंकि गांव में, कस्बों में, शहरों में लोग यह कहते मिलते हैं कि इससे तो अंग्रेज ही अच्छे थे।
लोग समझते थे कि शोषक सरकार (विदेशी सरकार) चली गयी। अब तो चारों ओर आजादी ही आजादी है, और लोग सुखी होंगे। धनधान्य से सम्पन्न होंगे। बेकारी मिटेगी। गरीबी हटेगी एवं विषमता दूर होगी। भेदभाव की खाईं पटेगी, समानता आयेगी, सामाजिक समानता मिलेगीᄉ इस परिकल्पना से देश का आम आदमी खुशी से झूम उठा था।
किन्तु 15 अगस्त 1947 की पहली खुशी क्या लोगों के चेहरों पर दिखायी पड़ती है? प्रतिवर्ष जब भी 15 अगस्त आता है तो क्या देश के लोगों में वही खुशी की लहर दौड़ती दिखती है? क्यों लोग उतने ही उत्साह से इस आजादी के जश्न को मनाते हुए हमें दिखाई नहीं पड़ते हैं? क्या बड़े बड़े जलसे होते दिखते हैं? सच्चे हृदय से यदि उन प्रश्नों के उत्तर खोजे जाये तो हमें उनका उत्तर न में ही मिलता है तो फिर प्रश्न उठता है किᄉ
आखिर ऐसा क्यों ? क्यों लोग इस आजादी के उत्सव से दूर होते जा रहे हैं? लोगों में वह लगन और उत्साह क्यों नहीं उमड़ता हुआ दिखाई पड़ता है?
तब हमें लोगों के बीच जाकर खोजना पड़ता है कि उनके आजादी के सपने कहां तक पूरे हुए?
आसमान से टूटा खजूर में अटका

आजादी मिली है? हां मिली है। किनको? जिनको जरूरत थी उनको या जिन्हें अंग्रेजों के समय में भी आजादी हासिल थी उन्हें? आजादी क्या उन्हें मिली, जो गुलाम था तन से, गुलाम था मन से और गुलाम था धन से? या आजादी उन्हें मिली जो सशक्त था, बलशाली था, धन से ऐश्वर्यशाली था, केवल मानसिक तौर पर कभी उसके स्व को धक्का लगता था एवं वह वर्ग सोचता था कि वह मानसिक तौर पर स्वतंत्रा नहीं था। क्योंकि उसके उ+पर अंग्रेजी शासक था और वह उसे भी तोड़ने के लिए तिलमिला उठता था। यद्यपि ऐसा वर्ग अंग्रेजी शासन से साठगांठ करके दीन, हीन, कृषक जनसमुदाय का भरपूर आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक रूप से शोषण करता था।
जब आजादी की लहर उठी तो उसमें देश के हर वर्ग का व्यक्ति जूझने लगा। बहुजन समुदाय गरीब था, शोषित था, और पीड़ित था। वह मानसिक दासता से मुक्ति चाहता था। वह मुक्ति चाहता था आर्थिक असमानता से। वह मुक्ति चाहता था सामाजिक विषमता से। वह मुक्ति चाहता था धार्मिक शोषण की जंजीरों से। इसलिए वह मरे मन से नहीं, अपितु उत्साहित मन से इस स्वतंत्राता संग्राम में कूद पड़ा और परिणाम यह रहा कि अंग्रेज, जन आक्रोश से समक्ष अंततः हिल उठा। शोषक समझ गया कि अब अधिक दिन भारत को गुलाम नहीं बनाये रक्खा जा सकता। यद्यपि आजादी की इस निर्णायक लड़ाई में भारतीय समाज का शोषक वर्ग बराबर अंग्रेजों का साथ देता रहा। फिर भी वह उनकी आशा का दीप नहीं बना रह सका। अपने गोरे प्रभुओं के पैर नहीं जमा सका। क्योंकि जन जन की आंधी चल उठी थी।
मासूम बच्चों से लेकर बूढ़ों तक ने ललकार लगायी। सधवा से लेकर विधवा तक ने अपने खून की आहुति दी। इस महायज्ञ में बहनों ने भी होम किया। पत्नियों ने पतियों का बलिदान दिया। माताओं ने पुत्राों को हंसते हंसते बलिदान कर दिया। सबका त्याग, तपस्या, लगन और सबसे बड़ी बात, आजादी से सांस लेने की ललक ने, वह तूफान खड़ा किया, जिनके समक्ष अंग्रेजी शासन का झंडा हिल गया, और देश आजाद हो गया। खुशी, चारों ओर खुशी। अंग्रेजी शासन के आकाश से गिरने वाली स्वतंत्राता कहां आकर रुक गयी? यह एक अहम प्रश्न सबके मन में उठता है। क्या आजादी भारत के जन जन के मन को आंदोलित कर सकी? वह तो उन्हीं लोगों के बीच आकर रह गयी, जो अंग्रजी शासन में भी पूरे नहीं तो आधे हुकमरा थे। भारत का बहुजन आजादी को न तो उस समय जान पाया, जब वह मिली थी, न वह आज ही उसको समझ सका है। वह तो आज भी शोषण का शिकार है। बलात्कार, अत्याचार, मार ही उसके हिस्से में आयी है। इस स्थिति को देख कर कोई भी यह कह सकता है कि अभी आर्थिक, सामाजिक एवं धार्मिक दासता का ही बोलबाला है। बहुजन अब भी गरीबी व भुखमरी का शिकार है। भारत का अल्प जन ही आजादी का सुख भोग रहा है। गरीब और गरीब हो रहा है और अमीर और भी अमीर। बरबस यह ध्वनि गूंज उठती है कि आजादी मिली तो सही किन्तु वह चंद लोगों को जो पहले से सुखी थे, सम्पन्न लोगों में आकर अटक गयी है। आसमान से गिर कर खजूर में अटक गयी है। यह सर्वमान्य आजादी तो नहीं है।
कहां है वह भारत?
इस देश की समृद्धि, वैभव के सम्बंध में कुछ तो नहीं कहना चाहिए किन्तु इतना ही काफी होगा कि यह देश सोने की चिड़िया कहलाता था। इसका क्या तात्पर्य है? क्या इस देश के पक्षी सोने के अंडे देते थे। इस देश की चिड़ियां सचमुच सोने की होती थीं या हैं? क्या सही अर्थों में इस देश की चिड़ियों का रंग ही सुनहरा था या है? नहीं। ऐसी बात नहीं कि भारत की चिड़ियां सोने के अंडे देती रही हों, और अब सोने के अंडे देने बंद कर दिये हों। इसका अर्थ है कि जिस समय भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था उस समय देश सुख समृद्धि के शिखर पर चढ़ा था। चारों ओर सुख ही सुख था। खुशियाली ही खुशियाली थी। देशवासी सुसंस्कृत, बलशाली, सुंदर, वैभवशाली, थे। किन्तु यह बरकरार नहीं रह सका। इनके जीवित उदाहरण पुरातात्विक खोजों से स्पष्ट होता है। मोहनजोदड़ों, भूहदंडों, लोथल आदि स्थल हैं, जो आर्यों के आक्रमण के पूर्व की समृद्धि के गीत आज भी खंडहरों से निकल कर गा रहे हैं। तत्कालीन शौर्यगाथाएं, देवासुर संग्रामों में असुरों के बड़े बड़े नगर राज्यों एवं उनके विशालप्रस्तर दुर्गों के वर्णन से स्पष्ट होती है। ऋग्वेदादि की रचनाओं के वर्णन प्रचुरता से पाये जाते हैं।
इस प्रकार धनधान्य एवं समृद्धि से भरा यह देश इतने गर्त में कैसे गिरा? क्या एकाएक यह निर्धन हो गया? दैवी विपदाएं आयीं? क्या विदेशी आक्रमण से यह सब नष्ट हो जाएगा? भारत की इस वैभवशालीनता, पर पहला हमला, बर्बर और जंगली शिकारी जाति घुमंती दस्तों का हुआ, जो कि अपने जानवरों के साथ नित्य नये घास के मैदानों की तलााश में इधर उधर झुंड में घूमते रहते थे। क्योंकि इनके अपने पशुओं के लिए चारे व भोजन की समस्या उठती रहती थी। किसी प्रकार यह घुमंतु दस्ता भारत के पश्चिमी उत्तरी दर्रों से जैसे ही घुसा और देखा कि इस देश की धरती इतनी धन्य धान्य से परिपूर्ण है उनका मन यहां पर ललचाया। सुख समृद्धि के सागर में हलचल मची। ज्वार भांटे आये। तूफान उठा। और उन आक्रमणकारी शिकारी झुंडों ने यहां के निवासियों को अपने छल बल भरे आक्रमणों से, न केवल परास्त किया, वरन उनके समृद्ध नगरों पर अधिकार करके उन्हें बेघर कर दिया। भटकने वाले आवासित हो गये और बसे हुए शांति प्रियजन निर्वासित होकर छितर गये। वह आदि भारत, जिसकी उन्नत सभ्यता आज जमीन खोद कर देखी जा रही है, कहां है? उसके बाद जिस भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता रहा, उसके निर्माण में गरीबों, शोषितों, बहुजनों का योग था! उनकी श्रम साध्यता का प्रतीक था। वह भारत भी आज दिखायी नहीं पड़ता है। विज्ञान की प्रगति के गुणगान किये जाते हैं। शोषण की आग में जलने वालों की पीड़ाओं को नजर अंदाज करके भारत का शोषक वर्ग जश्न मनाता है। मानवता की, उस बड़े समाज की, जिसका खून पसीना अब भी बह बह कर उनके अभाव की नदी को प्रवाहित कर रहा है। क्या दशा है? क्या यही वह देश है जा जगतगुरु कहलाता था? क्या यह वही भारत है जिसके धार्मिक मिसनरी विशेष कर, बौद्ध भिक्षु हिमालय को लांघ कर, रेगिस्तान को फांद कर, अपने यश गौरव का झंडा फहराने, विश्व को मानवता का सबक पढ़ाने गये थे।
आज तो हम परोन्मुखी नजर आते हैं। अपने ही देश में अपने भाइयों को सता कर, उनका शोषण कर, अपने ऐश आराम को संकुचित से संकुचित रूप में उपभोग करने में संलग्न हैं।
बरबस हमारा मन कह उठता है कहां है वह भारत? जो सम्पन्न था समृद्ध था। कहां है वह देश जिसके गौरव चिह्न आज अन्य देशों में प्रकट हो रहे हैं? क्या हम अपने उस बिगत भारत को पुनः गौरवान्वित रूप में बना सकेंगे?

अंग्रेजों की जगह पर ?
भारत की दुर्दशा की कहानी का जो भी राज रहा उसमें विदेशियों की लूट काफी महत्वपूर्ण रही है। प्राचीन भारत की संस्कृति, समृद्धि का विशद वर्णन उन आक्रमणकारियों के ग्रंथों में भी मिलता है। इनमें प्रथमतः मध्य एशिया से आने वाली घुमंत्‌ जाति के टुकड़ों के आक्रमण है, जिनके झुुंडों ने एक साथ ही भारत में प्रवेश नहीं किया, अपितु कई वगोर्ं में बंट कर कई बार झुंड के रूप में आये। और इन बर्बर जाति के लुटेरों ने तो भारत की सरजमी को भरपूर रौंदा, लूटा, खसोटा साथ ही यहां की वैभवशाली शांतप्रिय जनता को छल बल नाना प्रयत्नों से ठगा और उनका राज्य भी छीना। इन लुटेरों ने यहां वास ही नहीं कर लिया वरन विजित बना कर यहां के मूल आदिवासियों को दास, दस्यु, राक्षस, असुर आदि नाना नामों से सम्बोधित किया और अपना प्रभुत्व कायम करके साम्राज्य स्थापित किया। इन आक्रमणकारियों के पूर्व की वैभवशाली संस्कृति सिन्धु घाटी की संस्कृति के नाम से जानी जाती है, जिसकी वैभवशालीनता का मुकाबला 18वीं, 19वीं शताब्दी का योरोप भी नहीं कर पा रहा था।
अपना शासन कायम कर लेने पर जिस सामाजिक एवं शासन पद्धति का प्रणयन इन आक्रमणकारियों ने किया वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इन विजेताओं ने एक ऐसी समाज व्यवस्था, जो विषमतामूलक थी, का निर्माण किया। शासन पद्धति ऐसी निर्मित की, कि जनता का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भी सहयोग नहीं रखा गया। और सम्पूर्ण जनता गुलाम बना कर रखी गयी।
भारत की दुर्दशा का अंत यहीं पर नहीं हुआ। इन आक्रमणकारियों को निमंत्रिात भी पहले आक्रमणकारियों के ही समाज के लोगों ने किया। इन नयी लुटेरी जातियों ने अपना साम्राज्य कायम किया, किन्तु शासन के बडे+ बड़े ओहदों पर उन्हीं को रखा जिनको इन्होंने हराया था। परिणामतः दो लुटेरी इकाइयों ने मिल कर भारत की आम जनता को पीसना व चूसना जारी रखा। धीरे धीरे तीसरे प्रकार के आक्रमणकारी भारत में आये थे जो व्यापारी बन कर आये और शनैः शनैः इन्होंने सम्पूर्ण भारत पर एकछत्रा राज्य कायम कर लिया। इस जाति का मुख्य केन्द्र तो इंग्लैण्ड रहा ही, साथ ही साथ इस कौम ने भी उन्हीं पहले वाले लुटेरों से साठगांठ कर ली। अंग्रेजों ने भारत को दो तरफ से लूटना प्रारम्भ किया। आर्थिक स्तर पर और सांस्कृतिक स्तर पर। भारत की सांस्कृतिक विरासत को धीरे धीरे समाप्त कर अंग्रेजी संस्कृति को स्थापित किया और भारत को लूट लूट कर इंग्लैण्ड भेज भेज कर खोखला कर दिया। देश भीतर भीतर गरीब होता चला गया। फलतः लोगों ने बगावत की और अंग्रेजों को भारत छोड़ कर अपने देश वापस चला जाना पड़ा, जनता ने खुली बगावत की। किन्तु यहां भी उन्हीं पहले वाले शासक समुदाय के हाथों राजे महाराजे महसूस करते रहे कि अंगे्रज उनका मालिक है। जनता दो प्रकार के शासकों से चूर हो रही थी। एक तो अंग्रेज शासक की गुलामी तले दूसरे देश के काले अंग्रेज शासक जो शासन पर थे, की गुलामी की जंजीरों के तले।
जब सम्पूर्ण भारत अंग्रेजी शासन के खिलाफ कमर कस कर सड़कों पर उतर आया तो उसने सोचा था कि दोनों प्रकार के अंग्रेजों से मुक्ति मिलेगी और सच्चे अथोर्ं में जनता की शासन में भागीदारी होगी। अंग्रेजी नौकर यह शह गये। नेतृत्व परिवर्तन हो गया। अब विलायत केन्द्र न होकर दिल्ली केन्द्र हो गया। उस शासन की कुर्सी पर अंग्रेज न होकर काले अंग्रेज रहे। इस परिवर्तन से देश को क्या मिला? भारत की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। आम आदमी को सही आजादी नहीं मिली। पहले ही की तरह पूंजीवादी, शासनवादी, वर्णवादी शासन की उन्हीं कुर्सियों पर वही कायम रहे जो अंग्रेजों के समय रहे। अब तो और निरकुंश होकर निर्द्वन्द्व होकर शासन पर गये और पहले से उनकी सत्ता पूरब की ओर बढ़ गयी। धन दौलत एकत्रा करने की भूख बढ़ गयी। परिणामतः भ्रष्टाचार, कुनबापरस्ती, जातिवाद, वर्णवाद, पूंजीवाद, शोषणवाद का जहर समाज में फैल गया और देश को मरणासन्न बना दिया।
इस प्रकार भारत से अंग्रेज चले गये। उनकी गोरी चमड़ी वाले दिल्ली, लखनऊ, बम्बई, कलकत्ता आदि पर नहीं रहे, किन्तु शोषण की उनकी व्यवस्था उसी प्रकार बराबर रोज बरोज चली आ रही है। सत्ता परिवर्तन तो हुआ, राज्य परिवर्तन नहीं हुआ। सच्चे अथोर्ं में शासन जो जनता के हाथों में आना चाहिए था वह नहीं आया। अपितु उनके हाथ और बंध गये। अंग्रेज चले गये, उनकी राजपद्धति कायम रही।
रोग से मुक्ति नहीं
आजादी के दीवानों ने यह समझ कर कि गुलामी ही हमारी तनज्जुली का कारण थी, स्वराज्य स्थापना की थी, और अथक त्याग, अदम्य उत्साह एवं लगन के साथ इस गुलामी को दूर फेंक देना चाहते थे। साथ ही आजादी लोगों को मिले यह संकल्प लेकर अमिट बलिदान किया। सभी स्त्राी पुरुष पथ पर चले। अंग्रेजों के खिलाफ एक आक्रोश की लहर सारे देश में फैली और जनता जनार्दन एक नींद से जाग कर साथ देने के लिए आगे आये।
क्या अमीर क्या गरीब, क्या शहरवासी व गांववासी नये स्वराज्य की कल्पना मात्रा से ही उत्साहित थे। अंग्रेजों के खिलाफ एक निर्णायक युद्ध हुआ। दोनों मागोर्ं से लोगों ने युद्ध संचालित किया। कुछ क्रांतिकारी मार्ग की ओर अग्रसर थे। कुछ शांतिमय मार्ग के अनुयायी थे। अंग्रेजों ने भारत की जनता की भावना को समझा और जब उन्होंने यह समझ लिया कि भारतवासियों को अब गुलाम नहीं बनाये रक्खा जा सकता हैᄉ आजादी की भूख भारतवासियों को प्राणों से प्रिय हो गयी है, तब उन्होंने भारत से चले जाना ही उचित समझा और देश के शासन की बागडोर भारतीयों के हाथों में सौंप दी।
वह दिन भारत के इतिहास का स्वर्णिम दिन था। रात से ही चारों ओर स्वराज्य रूपी खुशी के बादल उठ रहे थे। प्रसन्नचित्त लोग सड़कों पर नाच रहे थे। उल्लास का संचार था। जीवंत प्रवाह था। हर हृदय में आनंद ही आनंद, हर व्यक्ति आजादी की लहर में डूब उतरा रहा था।
गुलामी की जंजीर टूटी। स्वतंत्राता आयी। किन्तु यह भावना कुछ दिन बाद काफूर नजर आयी। लोगों का इस आजादी से विश्वास टूटता नजर आया। ग्रामवासी हो या शहरवासी हो, कुछ लोगों को छोड़ कर, आम आदमी यह सोचने लगा इस आजादी से तो गुलामी भली थी। आखिर वह व्यक्ति ऐसा क्यों सोचने लगा? उत्तर स्पष्ट है कि जिस आजादी की कल्पना उसने की थी वह नहीं आयी। आजादी जन जन तक नहीं पहुंची।
आजादी का वैभव एक ओर चंद लोगों में सिमट कर रह गया। आम जनता को आजादी का एक झोंका भी नहीं लगा। इसीलिए उनका विश्वास टूट चला। उसके धैर्य का बांध बंधा नहीं रह सका, और वह जनवाणी में फूट चला कि आजादी आसमान से टूटी तो किन्तु खजूर में अब अटक गयी। स्वराज नहीं स्वराज्य आया। विदेशी गया। परदेशी राज की जगह स्वदेशी राज कायम हो गया। किन्तु सच्चे अथोर्ं में स्वराज नहीं आया। समाज का भ्रम दूर हो गया। उसकी आंखें खुलीं तो वह देखता ही रह गया। इलाज हुआ। रोग बरकरार रहा। स्थिति यह आयी कि रोगी चलने की तैयारी करने लगा किन्तु रोग उसे दबाता रहा। आदमी जिसे दवा समझता रहा, उसके मौत की घंटी बन कर आयी। रोग अच्छा हो रहा है ऐसा वह समझता रहा किन्तु अब समझा कि जिसे रोग मुक्ति समझ रहा था, वह उसका दिवास्वप्न था, भ्रम था, रोगमुक्ति नहीं हुई किन्तु उसकी जीवन से मुक्ति अवश्य हो रही है। यह धारणा जन जन में भर रही है क्यों? इसलिए कि वह खजूर में अटका स्वराज उन तक नहीं पहुंच सका है?
दलितों के साथ धोखा
आजादी के पूर्व भारतीय दलितों ने सपना देखा था कि उन्हें भी आजादी मिलेगी। वे लोग भी दासता की जंजीरों से छुटकारा पा जाएंगे। किन्तु लगभग 4 दशकों की स्वतंत्राता के बाद भी। भारत के ऐतिहासिक पृष्ठों को पलट कर देखने पर यही मिलता है कि दलितों के साथ किये गये वायदे केवल उन्हें भुलावे में ही रखने के लिए किये थे। उनकी अस्मिता के साथ खिलवाड़ होता रहा। सवणोर्ं शोषकों द्वारा उनके संवैधानिक अधिकारों के साथ बलात्कार होता रहा। और वे अत्याचारीगण ही सबसे अधिक शोर करते रहते हैं कि दलितों के लिए महानतम कार्य किये जा रहे हैं। देश विदेश में इतना व्यापक प्रचार किया गया कि दलितों के लिए यह किया जा रहा है, वह किया जा रहा है। इतना रुपया खर्च किया जायेगा। इस प्रचार रूपी जहर का प्रभाव शांत वातावरण में काफी गहराई तक होता गया, जिसने भारतीय समाज की खोखली दीवारों तक को हिला कर रख दिया। सरकारी या अर्ध सरकारी तंत्राों द्वारा इतना कुत्सित प्रचार किया गया कि अनुसूचित जाति/जनजाति पिछडे+ वर्ग के हित के लिए सरकार अमुक कार्य कर रही है, अमुक धनराशि खर्च कर रही है, अमुक व्यापार हेतु इतना खर्च कर रही है, उनके आवास हेतु अमुक योजना लागू की जा रही है। यद्यपि ऐसी योजनाएं केवल कागज तक ही सीमित रह जाती हैं, कभी भी कार्यरूप में परिणित नहीं होती हैं। किन्तु इस प्रचार से विद्वेषकारी भाव, समाज में पैदा होता चला गया। इसकी प्रतिक्रिया में आरक्षण विरोधी आंदोलन, सम्पूर्ण देश में प्रारम्भ किये जाने का षड्यंत्रा किया गया परिणामस्वरूप, सम्पूर्ण भारत गम्भीरता से गुजर रहा है। हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और। इसी प्रकार सरकार के दोनों कार्य दिखावटी रहे। कार्य तो कुछ किया नहीं गया सिर्फ पोस्टरबाजी, रेडियोबाजी एवं जोर जोर से झूठा प्रचार किया गया कि दलितों के लिए बहुत कुछ किया गया है और किया जा रहा है। जबकि असलियत यह है कि दलितों के हितों के लिए न के बराबर कार्य किया गया।
गांवों, शहरों, यत्रा, तत्रा सभी जगह दलित पिछड़े वर्ग की इतनी दयनीय स्थित है जो सोच के बाहर है। कोई बाहरी व्यक्ति सोच भी नहीं सकता कि इतने निचले स्तर का जीवन यापन करने का कानून व सामाजिक कानून तथा धार्मिक कानून अपने ही धर्मावलम्बी भाइयों/बंधुओं के साथ बरता जाने की शास्त्राीय मान्यता है। इनकी दशा आज भी गुलामी में बदतर है, पशुओं से बदतर जीवन इन दलितों का है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय में अखिल भारतीय घोषित कर्मचारी संघ बनाम भारत सरकार के वाद का निर्णय करते हुए माननीय जस्टिल कृष्णा अय्यर ने अपने निर्णय को जिन पंक्तियों से प्रारम्भ किया है वह एक हृदय विदारक सच्ची तस्वीर है। माननीय जस्टिस अपने निर्णय को प्रारम्भ करते हुए कहते हैं किᄉ श्ज्ीम ंइवसपजपवद वि ेसंअमतल ीें हवदम वद वित सवदह जपउमण् त्वउम ंइवसपेीमक ेसंअमतलए ।उमतपबं ंइवसपेीमक पजए ंदक ूम कपक पजए इनज वदसल जीम ूवतके ूमतम ंइवसपेीमक दवज जीम जीपदहण्च्च्
अर्थात ''दासता को समाप्त हुए युग बीत गया। रोम ने दासता समाप्त की, अमेरिका ने इसे समाप्त किया, हमने भी किया, किन्तु हमने केवल दासता शब्द मात्रा ही समाप्त किया, दासता नाम की चीज को नहीं।''
नौकरियों में आरक्षण रहते हुए किस प्रकार इन दलितों को भर्ती किया गया इसका खुलासा करते हुए माननीय जस्टिस अय्यर ने पुनः कहा कि निम्न तालिका से स्पष्ट होता है कि इन दलित एवं पिछड़े वर्ग की स्थिति, प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी की नौकरियों में सूक्ष्मदर्शीय यंत्रा के द्वारा देखी जाने वाली स्थित है। साथ ही क्लास तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी में भी इनकी स्थिति नगण्य है। सरकारी नौकरियों में इन दलितों को प्रथम श्रेणी एवं द्वितीय तथा तृतीय, चतुर्थ श्रेणी में किस प्रकार भरती किया उसका विवरण निम्न प्रकार हैᄉ
अनुसूचित एवं अनुसूचित जनजाति का नौकरियों में भरा गया प्रतिशत

वर्ष प्रथम श्रेणी द्वितीय श्रेणी तृतीय श्रेणी चतुर्थ श्रेणी
1 2 3 4 5
एस.सी. एस.टी. एस.सी. एस.टी. एस.सी एस.टी. एस.सी. एस.टी.
1.1.70- 2.26. 0.40 3.84 0.37 9.27 1.47 18.09 3.59
1.1.71- 2.58 0.41 4.06 0.43 9.89 1.70 18.37 3.65
1.1.72- 2.99 0.50 5.13 0.44 9.77 1.72 18.61 3.82
1.1.73- 3.14 0.50 4.52 0.49 10.05 1.95 18.37 3.92
1.1.74- 3.25 0.57 4.49 0.49 10.33 2.13 18.53 3.84
1.1.75- 3.43 0.62 4.90 0.59 10.71 2.27 18.64 3.99
1.1.76- 3.46 0.68 4.51 0.74 11.31 2.51 18.75 3.93
4.1.77- 4.16 0.77 8.07 0.77 11.84 2.78 19.07 4.35
1.1.78- 4.05 0.85 6.44 0.88 12.22 2.86 19.13 4.60
1.1.79- 4.75 0.94 7.33 1.03 12.55 3.11 19.32 5.12
उपर्युक्त तालिका माननीय सर्वोच्च न्यायालय में माननीय न्यायमूर्ति जस्टिस अय्यर ने अपने उपरोक्त मुकदमे को निर्णति करते हुए प्रस्तुत की है इससे स्पष्ट रूप से जाहिर होता है कि जो भी सीटें अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षित हो गयी थीं, उन्हें ईमानदारी से नहीं भरा गया और उसकी जगहें अन्य आरक्षित लोगों से भरी गयीं। उ+परी तालिका के देखने से पता चलता है कि सन्‌ 1970 में जो प्रतिशत इन वगोर्ं का था उसमें 10 वषोर्ं के बाद भी कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया है। जो 19170 में अनुसूचित जाति के लोगों का प्रतिशत 2.26 और 0.40 था वह 1979 में 4.75, 0.94 रहा। कहां है वह रिजर्वेशन? कहां है राष्ट्र के सभी नागरिकों को उन्नति का समान अवसर प्रदान करने वालों की जमात? क्या इतने बड़े अन्याय के विरुद्ध आंदोलन करने की उनकी भीतरी आवाज नहीं उठती? क्या उनके अंदर का मानवीय हृदय मर गया? क्या उनमें संवेदना समाप्त हो गयी? यदि नहीं तो वे लोग कहां रह रहे हैं? इससे यही स्पष्ट है कि लोगों की नीयत साफ नहीं है। उनके मस्तिष्क अभी भी संकीर्ण हैं।
सरकारी नौकरियों के आरक्षण की स्पष्ट तस्वीर देखी है। अब शिक्षा के क्षेत्रा में देखें कि कितना न्याय इन जातियों के साथ किया गया। हम केवल गांधी जी के देश गुजरात के अहमदाबाद स्थित बी.जे. मेडिकल कालेज के आंकड़े उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत करना चाहते हैं जो निम्नलिखित हैंᄉ
(1) सन्‌ 1974 से 1979 तक स्नातकोत्तर चिकित्सा में
क्रम सं. अनु. जनजाति एवं पिछड़े वर्ग के कितने सवर्ण प्रतिशत सवर्ण प्रतिशत अनुजा. जन
827 57 770 92 प्रतिशत 8 प्रतिशत
(2) चिकित्सा प्राध्यापक, सहयोगी प्राध्यापक, सहायक प्राध्यापक
प्राध्यापकों की कुल संख्या एस.सी.एस.टी. सवर्ण सवर्ण प्रतिशत एस.सी./एस.टी.प्रतिशत
737 22 715 98 प्रतिशत 2 प्रतिशत
इन उदाहरणों के उपरांत उत्तर प्रदेश के इंजीनियरिंग विभाग का एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहूंगा उससे भी स्पष्ट होगा कि कितना न्याय इस दलित वर्ग के साथ किया गयाᄉ
उत्तर प्रदेश शासन द्वारा प्रकाशित सूचना के अनुसार सिंचाई विभाग में 1.1.80 तक अभियंता अधिकारियों का प्रतिनिधित्व निम्न प्रकार हैᄉ
अनुसूचित जातियों एवं अनु. जन जाति अधिकारियों
का प्रतिनिधित्व
ैब् ैज्
आरक्षित वास्तविक प्रतिशत
पद नियुक्ति आरक्षित वास्तविक प्रतिशत
क्र.सं. श्रेणी कुल संख्या पद नियुक्ति
(1) प्रथम 662 119 6 0.9 13 ᄉ ᄉ
(2) द्वितीय 2468 445 39 16 49 3 102
योग कुल 3 30 564 45 ᄉ 62 3 ᄉ
द्वितीय तालिका
सिंचाई विभाग में महवार नियुक्ति का विवरण
क्रम सं. पद पदों की संख्या ैब्ध्ैज् प्रतिनिधित्व
1 प्रमुख अभियंता 1 शून्य
2 प्रमुख अभियंता 22 शून्य
3 अधिशाषी अभियंता 136 शून्य
4 अधिशाषी अभियंता 24 शून्य
अᄉप्रशासनिक पद
बᄉअधिशाषी अभियंता 608 दृदृ 21 कृषक अधिषाशी
पद अभियन्ता 120 प्रभारी सहायक अभियंता
5 सहायक अभियंता 2339 27 1.15 प्रतिशत
योग 3130 48 1.53 प्रतिशत

अधोलिखित आंकड़े लगभग सही है।
विभिन्न प्रदेशों में पूर्ण किये गये आरक्षित स्थानों का प्रतिशत
ैजंजम ब्सें प् ब्सें प्प् ब्सें प्प्प् ब्सें प्ट
आंध्र 3-80 3-00 8-00 12-00
गुजरात 1-48 3-47 8-75 70-70 हरियाणा 3.50 3-20 8-40 27-50
कर्नाटक 4-70 4-60 7-60 17-20 केरल 2-34 3-76 6-17 13-40 मध्य प्रदेश 0-93 1-97 7-00 12-30 महाराष्ट्र 4-60 5-90 12-70 24-70 उड़ीसा 1-00 5-96 7-70 17-80 पंजाब 7-21 12-30 12-13 37-00 राजस्थान 8-60 10-86 11-20 21-80 तमिलनाडु 4-00 3-31 11-00 ᄉ
उत्तर प्रदेश 4-10 3-40 3-40 16-40 बंगाल 1-35 2-00 3-07 11-70
कर्मचारियों की संख्या (अ.जा.अ.ज.जा. पिछड़ी जाति अ. से. की
ओबरा विद्युत गृह संख्या प्रतिशत सहित)
वर्गों का कार्यरत अनुसूचित जाति अनुसूचित ज. जा. पिछडे+ वर्ग अन्य वर्ग
वर्गीकरण संख्या सं. प्र. सं. प्र. सं. प्र. सं. प्र.
प्रथम 99 4 4-04 6 6-06 7 7-07 82 82-83
द्वितीय 022 21 6-52 30 9-31 26 8-07 255 23-50
तृतीय 3640 246 6-76 30-93 1125 30-92 351 9-92 1902 48-53
चतुर्थ 2189 423 19-32 16-07 930 42-48 190 8-62 632 70-47
टोटल 6-50 694 11-13 19 0-31 2019 33-98 584 9-49 27-92 45-09

नेतृत्व किसका?
समाज के लोगों के सामने यह प्रश्न बार बार उठता है कि आखिर इस मुक्ति का आंदोलन के नेतृत्व कौन करेगा। प्रश्न इतना ही नहीं है कि नेतृत्व कौन करेगा? बल्कि प्रश्न सच्चे नेतृत्व का है?
1. नेतृत्व उनके द्वारा जो स्वयं शोषक समाज के हैं।
2. नेतृत्व उनके द्वारा जो स्वतः शोषित/गुलाम समाज के हैं।
यहीं एक प्रश्न और उठता है कि आखिर सच्चा नेतृत्व कौन दे सकेगा या जो अब तक इस प्रकार के आंदोलन को नेतृत्व देते रहे हैं, उनमें कौन सबको नेतृत्व देते रहे?
नेतृत्व निम्न प्रकारᄉ
1. शोषक समाज का
2. शोषित समाज का
3. शोषक जो शोषितों का हितचिन्तक
4. शोषित जो शोषितों का हितचिन्तक
5. शोषितों का अहित चाहता हो।
समाज में दो प्रकार के लोग हैंᄉ
1. समृद्ध 2. जिनके पास कुछ भी नहीं है।
पहले वर्ग के पास उन्नति के सभी साधन हैं। भौतिक साधन भी हैं। आर्थिक समृद्धि भी उन्हीं के पास है। दुनिया की तमाम सारी उत्पादकता के स्रोत पर उन्हीं का एकाधिकार है। आधिपत्य है। उनको यह भी भय नहीं है कि वे कभी इन वैभवशाली, समृद्धिश्षाली व्यवस्था से विपरीत भी किये जा सकते हैं? इसलिए कि ऐसे समाज ने एक ही ओर से नहीं अपितु चतुर्दिक ऐसी घेराबंदी कर रखी है कि वह सुरक्षित रहता है समृद्धिशाली बना रहता है। नहीं अपितु और समृद्धिशाली होता चला आ रहा है। उस समाज ने इस प्रकार की योजनाएं क्रियान्वित कर रखी हैं जिनसे शोषण से पीड़ित व्यक्ति प्रकाश की एक किरण न देख सके और किसी भी प्रकार का विद्रोह न कर सके।
लेकिन उनकी यह समृद्धि तभी तक है जब तक समाज का दूसरा वर्ग जिसके पास कुछ भी नहीं है, बरकरार है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जब तक वंचित समाज है तब तक इस समृद्धिशाली समाज का अस्तित्व बना रहेगा। जगह जगह इन्हीं शोषित वंचितों को अधिकारयुक्त करने के आंदोलन चल रहे हैं या यूं कहा जाये कि चलाये जा रहे हैं। प्रश्न इतना ही महत्वपूर्ण नहीं है कि यह आंदोलन चलाये जा रहे हैं अपितु प्रश्न तो सच्चे नेतृत्व का है? गलत दिशा पर ले चलने वाला कमांडर अपनी सेना को दुर्दिन भोगने के लिए भटका सकता है।
शोषितों, वंचितों के आंदोलन का नेतृत्व यदि शोषक समाज से आया वर्ग करता है तो वह सुधारात्मक होता है। इतिहास इस बात का साक्षी है, जब भी कभी इन वंचितों में अपनी गुलामी से छुटकारा पाने की अकुलाहट हुई, तभी शोषक वर्ग से कोई न कोई व्यक्ति इनमें सुधार पैदा करने की बात का आंदोलन चला देता रहा है। ये समाज सुधारक कहला रहे हैं। हमें इनसे कोई ऐतराज नहीं है। अपितु हमारे अध्ययन का क्षेत्रा तो इस कसौटी पर है कि क्या ऐसे समाज सुधारकों के आंदोलन से दलित शोषक वंचितों के आत्मसम्मान प्राप्ति के आंदोलन में कुछ लाभदायक हो सका? यदि हम बारीकी से देखें तो उत्तर सकारात्मक नहीं मिलता है। नकारात्मक ही पाते हैं। हां, सकारात्मक उत्तर उस समाज के लोगों के लिए मिलता है जो स्वतः शोषण करने में उद्धत रहा है। दूसरी तरफ बड़ी ही खूबी के साथ वंचितों की मुक्ति को लेकर अपनी जिज्ञासा भी दब गयी और इन्हीं समाज सुधारकों के भूलभुलैयों में भटक गये। इसके क्या कारण थे? कारण स्पष्ट हैं कि ऐसे समाज सुधारकों के पास शोषक समाज का उन्मुक्त, 1. संगठित समर्थन, 2. प्रचार प्रचार की अधिकता 3. साधन की प्रचुरता थी।
एक दूसरे प्रकार का नेतृत्व हैᄉशोषक समाज का नेतृत्व। शोषण करने वाला समाज सोचता है जिसका वह शोषण करता चला आ रहा है उसके हित के लिए कुछ किया जाये, और करता तो वह कुछ भी नहीं है अपितु समाज में इतना झूठा शोरगुल व प्रचार करता है कि वह उस शोषित समाज के लिए यह कर रहा है, वह कर रहा है। वह केवल फर्जी व नुमाइशी ही होता है। क्रियात्मक कुछ भी नहीं होता है। ऐसे नेतृत्व के लोग, शोषितों में क्रांति के बीज अंकुरित न हो जाय, इसकी पूर्णरूपेण व्यवस्था करते रहे। उनको शोषक वर्ग हित साधन की चिन्ता रहती है। ये केवल मुंहजबानी दयालुता दिखलाता है जिसे हम लिप्स्टिक सम्पर्क कह सकते हैं।
एक ऐसा भी नेतृत्व वर्ग है जो शासक समाज का है, और शोषकों के हितचिन्तन का प्रभावी कार्यक्रम रखता है और साथ ही साथ शोषितों का अहित चाहता है। इन लोगों के हाथों नेतृत्व कभी भी सकारात्मकᄉ वंचितों के पक्ष में नहीं होगा। वह तो शोषण करने वालों के हित में होगा।
चौथे प्रकार के नेतृत्व का प्रश्न सीधे शोषित दलित वंचित समाज से जुड़ा हुआ है। वह होता तो शोषित समाज से ही है किन्तु उसका वैचारिक धरातल अपना कुछ भी नही होता है। वह तो मात्रा नुमाइशी ढांचा होता है। इसके पीछे दूसरों की सोची हुई उसकी योजनान्वित, योजना होती है। यह तो मात्रा माउथ स्पीकर होता है। पहले से टेप किये विचार ही वह प्रचारित करता है। हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि वह शोषक समाज का पिछलग्गू होता है, और शोषित समाज को गुमराह करने के लिए होता है। यद्यपि वह अपना समाज हित अहित नहीं समझ पाता है। शोषणकर्ताओं के हाथों की कठपुतली मात्रा होता है। आज प्रत्येक पार्टी ने कुछ ऐसा ही कठपुतली नेतृत्व पैदा कर रखा है। ये शोषितों को उसी शोषणी व्यवस्था में फंसाये रखने के लिए चारे का काम करते हैं। ये चमचा कहलाते हैं।
पांचवे प्रकार का नेतृत्व, शोषित समाज से सम्बंधित, यह भुक्तभोगी होता है। वह सच्चे अथोर्ं में शोषण की तकलीफों को स्वतः झेलता होता है। गुलामी के कष्टों को, अभाव की कड़क को, तिरस्कार की कटुता व कैसे लेपन का भुक्तभोगी है। यही नेतृत्व दलितों के हित का होगा तो क्या यह पूर्ण नेतृत्व है, कहा जा सकता है?
छठा और अंतिम वर्ग उनका है जो भुक्तभोगी तो हैं ही साथ ही साथ समस्त शोषित समाज की आजादी की भावना रखते हैं। योजनाएं रखते हैं। चिन्तन रखते हैं, क्रियाशील हैं। और उनके मार्ग का एक ही आदर्श बिन्दु होता है शोषणमुक्त समाज, वर्ण विहीन वर्ग विहीन समाज की स्थापना। यही नेतृत्व उभर रहा है। दलितों, शोषितों, वंचितों के मुक्ति आंदोलन का नेतृत्व सही माने में यही वर्ग करेगा। 85 प्रतिशत जनता अपना भला बुरा समझने लगी है। उनको जगाने का काम प्रारम्भ हो गया है। इस नेतृत्व वर्ग का स्पष्ट कथन ही नहीं प्रयास चल रहा है कि सच्चे मायने में समता स्वतंत्राता समानता एवं भातृत्व की नींव पर आधारित समाज का निर्माण हो, तभी देश उन्नति कर सकेगा। और यह तभी सम्भव है जबकि सही आजादी के पाने के इस आंदोलन की अगुवाई सही वर्ग के हाथों में होगी।
असली आजादी कोई रोक नहीं सकता
विषमता की गुलामी की जंजीर तोड़ फेंकने के लिए समाज उठ खड़ा हो गया है। विश्व के कोने कोने में विषमता की जंजीरों को तोड़ देने के लिए मन मचल उठा है। चंचल हो उठा है। स्वतंत्राता प्र्राप्ति की भावना तरुणाई पर आ रही है। इसी मुक्ति भावना ने ही संसार के बड़े बड़े साम्राज्य की सीमाएं तोड़ कर धराशाई कर दीं। उनके फौलादी हाथों ने साम्राज्यवादी किले की बड़ी बड़ी दीवारों की एक एक ईंट गिरा कर रख दी है, फूटी साम्राज्यवादी दीवालें दिखाई पड़ रही हैं। उन पर अनवरत आजादी के हथौड़े पड़ रहे हैं। लाखों लोग जूझ रहे हैं। उनका उत्साह उछालें मार रहा है। भावनाएं उद्धत हैं। संकल्प सुदृढ़ है। कार्य अनवरत गति से चल रहा है। चक्षुओं में स्वतंत्राता की प्रकाश किरणें दिख रही हैं। इसलिए बिना थके हारे वे स्वतंत्राता के युद्ध में युद्धरत हैं।
बडे+ बड़े साम्राज्यों को धराशायी इन्हीं वंचितों की फौलादी शक्ति ने किया। कभी न डूबने वाले सूरज वाला अंग्रेजी साम्राज्य धूलधूसिरित हो गया है। छोटे बड़े राज्य समाप्त हो गये हैं जो बचे हैं वह जन आंदोलनों से टूट रहे हैं। जमींदार समाप्त हो रहे हैं और स्वतंत्राता का प्रवाह आगे बढ़ता ही जा रहा है।
वंचित शोषित मजदूर अपने अधिकार समझने लगा है। अभी तक यह अपना कर्तव्य ही समझता था। वह समझता था कि मालिकों की सेवा ही उनका धर्म है ! अपने को मिटा कर मालिक को समृद्धिशाली बनाना उसकी नियति है। यह निराशा के गर्त में डूब गया था। भारत की किरण उसे दिख नहीं रही थी। हाड़ मांस गला कर अपना सब कुछ निछावर करके निर्माण कर रहा था। वह भी अपने लिए नहीं अपितु अपने स्वामी वर्ग के लिए। इसे वह पवित्रा कर्तव्य मान बैठा था। ईश्वरवाद, भाग्यवाद वर्णवाद, वर्गवाद, पूंजीवाद, राज्यवाद, सभी के कष्ट पाना उसने अपने जीवन का अंग मान कर अंगीकृत ही नहीं अपितु अपने रोम रोम में समाहित कर लिया था। अपने को पूर्णतया भूल चुका था। विस्मृति के गर्त में गिरा चुका था।
विश्व के उसी वर्ग में जीवन प्रवाह की धारा बह चली है। उसके सामने से अंधकार का आवरण हटता नजर आ रहा है। भारत में यह प्रवाह गतिमान हो चला है।
अत्तदीपो भव
अपनी आजादी लाने के लिए दूसरों की ओर ताकना छोड़ देना पड़ेगा। जो लोग यह समझते हैं कि सच्ची आजादी कहीं उ+पर से टूट कर धरती पर आयेगी, और वे उसका सुख भोग करेंगे, यह पूर्णतया भ्रम है। जो लोग इस प्रकार का दिखावा कर रहे हैं कि वे दलितों के लिए सच्ची आजादी दिलाने का प्रयत्न कर रहे हैं वे मूलतः शोषक समाज के ही हैं। वे सच्चे हृदय से नहीं चाहते हैं कि शोषित समुदाय सच्चे अथोर्र्ं में आजाद हो जावे। शोषणमुक्त हो जाये। वे तो चाहते हैं कि शोषितों की जमात किसी भी प्रकार कम न हो, ताकि उनको अपनी दादागिरी, नेतागिरी व मालिकीगिरी दिखाने का अवसर मिलता रहे।
किन्तु आज का दलित शोषित समाज उनकी करतूतों को समझ रहा है और बहुत ही तेजी के साथ अपने कंधे पर रखे गुलामी के जुये को फेक देने के लिए प्रयासरत ही नहीं हैं अपितु तड़प रहा है।
दलितों को भी यह समझना चाहिए कि उनकी अशिक्षा, अविद्या, गरीबी के बंधन को दूसरा कोई तोड़ने वाला नहीं है। दलित समाज को स्वतः अपने पुरुषार्थ का भरोसा करके उठना होगा। संगठित होकर गुलाम बनाये रखने वाली समस्त शक्तियों को चकनाचूर करना पड़ेगा। तभी तो वह सच्ची आजादी प्राप्त कर सकता है।
कब तक सरकारी सहायता की नाव पर बैठ कर दुखों के सागर को पार करने की ख्वाहिश रखते, क्या दुखों के महान सागर को पार नहीं किया जा सकता है? ऐसी धारणा हृदय में भी नहीं लानी चाहिए। सागर की अतल गहराइयों को चीर सुख के धरातल पर ले जाने वाले जहाज का निर्माण दलितों को स्वतः करना होगा। तभी वे अपने इस दुख के विशालतम सागर को विजित कर सकते हैं।
पराये पुरुषार्थ की आशा को छोड़ कर, अपनी कमर कस कर, आने वाली मार्ग की बाधाओं की परवाह किये बिना आगे दलितों का कारवां बढ़ चला है।
चतुर्दिक शोर हो रहा है कि दलितों के उत्थान में सम्पूर्ण सरकारी तंत्रा से लेकर नेता तंत्रा तक इनकी ही भालाई व उत्थान के लिए उद्धत और प्रयत्नशील है। सरकार, सरकारी तंत्रा, विभिन्न राजनैतिक पार्टियां व उनमें शीर्षस्थ, मूर्धन्य नेतृत्व वर्ग की एक ही चिन्ता है कि दलितों का उत्थान कैसे हो? तात्पर्य है कि सभी दलित उत्थान के लिए बेचारे पतले होते जा रहे हैं। यह चिन्ता इस सीमा तक सता रही है कि उन्हें हर समय दलित ही दलित दिखाई पड़ते हैं? चाहे आर्थिक मसला हो चाहे सामाजिक मसला जहां कहीं भी दलितों ने थोड़ी करवट बदली, सम्पूर्ण राष्ट्र को इनकी चिन्ता सताने लगती है। ऐसा भ्रम अखबार वाले भी फैलाने से नहीं चूकते हैं। आखिर ये हैं कौन? लिखने वाले कौन हैं? चिल्लपों मचाने वाले कौन हैं? तथा व्यापक प्रचार करने वाले कौन हैं? अखबारों के मालिक कौन हैं? ये वे ही सभी लोग हैं जो शोषकों की जमात से सम्बद्ध ही नहीं उसी शोषक खून से पले हैं। उनकी अभिरुचि क्यों कर दलित आजादी की ओर हो सकती है? उत्तर है स्वार्थ सिद्धि।
जब कभी कोई दलित या दलित समाज का एक बड़ा हिस्सा आडम्बरी वर्णव्यवस्था से मुक्ति पाने हेतु तथाकथित ईश्वर व वर्णव्यवस्था की गुलामी का जुवां तोड़ कर स्वतंत्रा खड़ा हो जाना चाहता है तो जबरन धर्मांतरण व साम्प्रदायिकता का ढोंग कह कर दबाने का प्रयत्न ही नहीं किया जाता है, बल्कि एड़ी चोटी का पसीना एक कर दिया जाता है। ये छिपे दुश्मन बहुत ही खतरनाक हैं, दलितों की आजादी के।
समाज के लिए अति आवश्यक हो गया है कि दूसरों की आस व सांस का सहारा छोड़ कर, तंद्रा को तोड़ कर, प्रभाव को त्याग कर, एक ही मार्ग अपनाना होगा और वह है डॉ. बाबासाहब आम्बेडकर का मार्गᄉ ÷अत्तदीपो भव' का मार्गᄉ अर्थात अपना दीपक आप बनो।

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